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पंजाब स्वास्थ्य विभाग 10 मार्च से मनाएगा ‘ग्लूकोमा सप्ताह’ ; स्वास्थ्य मंत्री ने जागरूकता पोस्टर किया जारी

ग्लूकोमा की रोकथाम के लिए समय रहते जांच और इलाज ज़रूरीः डा बलबीर सिंह
ग्लूकोमा की पहचान करने के लिए सरकारी अस्पतालों में लगाई छह अत्याधुनिक मशीनें
खबर खास, चंडीगढ़ :
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के आम लोगों को मानक स्वास्थ्य सहूलतें प्रदान करने के सपने को आगे बढ़ाते हुए पंजाब स्वास्थ्य विभाग द्वारा 10 मार्च से 16 मार्च, 2024 तक ‘विश्व ग्लूकोमा सप्ताह’ मनाया जायेगा। यह जानकारी गुरूवार को यहाँ पंजाब के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डा. बलबीर सिंह ने दी।
मंत्री ने इस सम्बन्धी जागरूकता पोस्टर जारी करते हुये बताया कि इस मुहिम के हिस्से के तौर पर पंजाब स्वास्थ्य विभाग की तरफ से इस हफ्ते के दौरान ज़िला अस्पतालों, सब- डिविज़नल अस्पतालों और सरकारी मैडीकल कालेजों में मुफ़्त ग्लूकोमा जांच कैंप लगाए जाएंगे जिससे ग्लूकोमा से पीड़ित लोगों की पहचान की जा सके और समय रहते इस रोग का इलाज किया जा सके।
उन्होंने सम्बन्धित अधिकारियों को राज्य की सभी स्वास्थ्य संस्थाओं में यह जागरूकता पोस्टर बाँटने के लिए कहा जिससे लोगों को ग्लूकोमा के लक्षणों और इलाज के बारे जागरूक किया जा सके।
राज्य के स्वास्थ्य ढांचे का काया-कल्प करने के मद्देनज़र पंजाब सरकार के प्रण को दोहराते हुए डा. बलबीर सिंह ने कहा कि ग्लूकोमा का पता लगाने के लिए छह अत्याधुनिक मशीनें ( नान-कांटेक्ट टोनोमीटर) पंजाब के छह ज़िला अस्पतालों में पहले ही स्थापित की जा चुकीं हैं, जबकि बाकी जिलों में ऐसी और मशीनें मुहैया करवाई जा रही हैं।
डाः बलबीर सिंह, जोकि ख़ुद आँखों के सर्जन हैं, ने कहा कि मोतिया दुनिया में इरवरसीबल ब्लाईंडनैस्स का सबसे बड़ा कारण है। 90 प्रतिशत मामलों में, ग्लूकोमा के कारण होने वाले अंधेपन को जल्द पहचान कर और उपयुक्त इलाज करके रोका जा सकता है। यह, आँख के दबाव (इंटरा- ओकूलर प्रेशर) में वृद्धि के कारण आपटिक तंत्रिका को हुए नुक्सान की वजह से होता है। ग्लूकोमा को कई बार नज़र का एक ‘ साइलेंट थीफ’ भी कहा जाता है क्योंकि यह शुरुआती लक्षणों को दिखाऐ बिना मरीज़ को अपूरणीय क्षति में डाल सकता है। मरीज़ को तब तक लक्षण नज़र नहीं आते जब तक बीमारी मध्यम या एडवांस पड़ाव तक नहीं पहुँच जाती।
बलबीर सिंह ने आगे कहा, “ किसी भी व्यक्ति को ग्लूकोमा हो सकता है परन्तु कुछ लोगों को और ज्यादा ख़तरा होता है जैसे कि 60 साल से अधिक उम्र, पारिवारिक इतिहास, डाक्टरी स्थितियों जैसे कि शुगर, हाई ब्लड प्रेशर, मायोपिया, कोरटीकोस्टीरोइड तैयारियाँ ख़ास कर लम्बे समय तक आँखों की दवा डालने वाले व्यक्ति। आँख की चोट के नतीजे के तौर पर भी ग्लूकोमा हो सकता है। शुरुआती खोज और सावधानी के साथ इलाज करवाने से ज़्यादातर लोगों की नज़र को बरकरार रखा जा सकता है।’’
ज़िक्रयोग्य है कि लगभग 12 मिलियन भारतीय इस बीमारी से पीड़ित हैं और 1.2 मिलियन इस कारण अंधेपन का शिकार हुए हैं। इसलिए जोखिम वाले लोगों और 40 साल से अधिक उम्र के लोगों को हर दो से तीन साल बाद आँखों की जांच करवानी चाहिए और 65 साल से अधिक उम्र के लोगों को हर छह महीने बाद आँखों की जांच करवानी चाहिए। ग्लूकोमा प्रबंधन में गंभीर चुनौतियां हैं जैसेः जागरूकता की कमी, अज्ञात और इलाज से वंचित मामले, ग्लूकोमा डायगनौस्टिक और इलाज सेवाओं तक बुरी पहुँच और इलाज की पालना से सम्बन्धित कई मुद्दे।
मंत्री ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग एन. पी. सी. बी. एंड. वी. आई. के अंतर्गत आईईसी गतिविधियों की एक क्रमबद्ध योजना बना रहा है जिससे लोगों में मोतिया की रोकथाम और नियंत्रण के बारे जागरूकता पैदा की जा सके, जिसमें स्कूलों में रेडियो भाषण, जागरूकता भाषन/ सीएमई, नुक्कड़ नाटक, जागरूकता रैलियाँ, भाषण, पेंटिंग मुकाबले, वाकाथन और सोशल मीडिया मुहिमें शामिल हैं।
इस दौरान मंत्री ने आम लोगों को इस हफ्ते लगाए जाने वाले मुफ़्त जांच कैंप में अपनी आँखों की जांच करवाने और ग्लूकोमा की रोकथाम के लिए योगदान डालने के लिए भी प्रेरित किया। इस मौके पर डायरैक्टर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण डाः आदर्शपाल कौर और स्टेट प्रोग्राम अफ़सर एन. पी. सी. बी. और वीआई डाः नीति सिंगला भी उपस्थित थे।

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