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‘नवजोत सिद्धू को तत्काल पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाए’

चंडीगढ़ : पंजाब के पूर्व पीसीसी प्रमुख नवजोत सिद्धू की बठिंडा में आयोजित ‘जितेगा पंजाब’ रैली के बाद कांग्रेस की आंतरिक कलह एक बार फिर से सामने आ गई है। रैली के बाद कांग्रेस में उनके खिलाफ बयानबाजी शुरू हो गई है। इसे लेकर पूर्व विधायकों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने पार्टी हाईकमान से सिद्धू को तत्काल पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने की गुहार लगाई है। वहीं, पूर्व विधायकों और पार्टी नेताओं की ओर से अपने खिलाफ मोर्चा खोले जाने के बाद सिद्धू भी नरम पड़ते नजर आए हैं। वीरवार को सिद्धू ने टवीट कर आक्रामक रवैया अपनाने की बजाय प्रदेश नेताओं को नसीहत दे डाली। कहा कि वह सरकार की नीतियों के खिलाफ संयुक्त रूप से इकट्‌ठा होकर विरोध करें।

 हर शहर, गांव में 100-100 कार्यकर्ता एकत्रित करने की सलाह

वीरवार को सिद्धू ने टवीट कर पार्टी पर कहा कि सरकार की नीतियों के खिलाफ हर गांव और शहर में 100-100 कांग्रेसी खड़े हों और उसका विरोध करें।

पूर्व विधायक कुलबीर सिंह जीरा, नकोदर से पूर्व विधायक नवजोत सिंह दहिया, अमृतसर दक्षिण से पूर्व विधायक इंदरबीर सिंह बोलारिया और गुरदासपुर से विधायक बरिंदरमीत सिंह पहाड़ा समेत अन्य पार्टी नेताओं जिनमें लखवीर सिंह लक्खा, दविंदर सिंह घुबाया, खुशबाज़ सिंह जट्टाना और अमित विज शामिल हैं, ने सिद्धू के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि सिद्धू को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाए। उन्होंने कहा कि भले ही वह पीपीसीसी के पूर्व प्रमुख के रूप में उनका सम्मान करते हैं लेकिन उनके कार्य अकसर पूरी तरह से पार्टी के हितों के खिलाफ काम करते आ रहे हैं।

इन नेताओं ने कहा कि राजनीतिक मामलों से निपटने में उनकी अनुशासनहीनता आमतौर पर पार्टी के प्रयासों के खिलाफ जाती है। उन्होंने कहा कि पंजाब में जहां कांग्रेस 2017 में 78 सीटें जीती लेकिन 2022 में पार्टी मात्र 18 सीटों तक सिमट गई। अध्यक्ष के रूप में वह अपने कर्तव्य में असफल रहे।

इन लोगों का आरोप यह भी था कि सिद्धू हमेशा पार्टी के साथ खड़े रहने के बजाए अपने महिमामंडन का एजेंडा चुनते हैं जिससे पार्टी की संभावनाओं को भारी नुकसान पहुंचा है। इन लोगों का कहना है कि सिद्धू न तो पीसीसी प्रमुख के रूप में पार्टी की मदद कर पाए और न ही एक टीम खिलाड़ी के रूप में।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि ऐसा भारत में चुनाव के लंबे इतिहास में शायद पहली बार हुआ कि जब चुनाव से ठीक दो दिन पहले घोषणा पत्र जारी किया गया क्योंकि सत्ता और नेतृत्व की स्थिति में रहते हुए सिद्धू का ध्यान पार्टी की ओर से सौंपे काम की बजाए अपना महिमा मंडन गाने का था और इससे सभी को नुकसान हुआ है।

गौर रहे कि इससे पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा ने सिद्धू की रैली का जिक्र करते हुए उन्हें खुद का मंच स्थापित करने की बजाए पार्टी के कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए कहा था। लेकिन इसपर सिद्धू ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई थी। खास बात यह थी कि सिद्धू की इस रैली में राज्य का कोई भी वरिष्ठ नेता शामिल नहीं था।