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किसान आंदोलन: उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र से कहा, हमने आपको बहुत समय दिया, हमारे संयम पर लेक्चर न दें

तीनों कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों की समस्या का निवारण निकाल पाने में केन्द्र विफल रहने पर उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को गहरी नाराजगी जताई. मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे से जब केन्द्र की ओर से अटॉनी जनरल केके वेणुगोपाल ने अपील करते हुए बोला कि वह कोई भी आदेश आज जल्दबाजी में पारित नहीं करें और इस मुद्दे में कुछ और समय दिया जाए तो सीजेआई ने बरसते हुए कहा, हमने आपको बहुत समय दिया है. हमारे संयम पर लेक्चर न दें. हम यह तय करेंगे कि आदेश कब पारित किया जाए. हम इसे या तो आज या फिर कल पारित करेंगे.

सीजेआई बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान किसान यूनियनों की ओर से पेश वरिष्ठ एडवोकेट दुष्यंत दवे ने राज्यसभा में ध्वनि मत से कृषि कानूनों को पारित किए जाने पर प्रश्न उठाया. वहीं, भारतीय किसान संघ की ओर से पेश वरिष्ठ एडवोकेट पीएस नरसिम्हा ने न्यायालय से कहा, अंतरिम आदेश नहीं पारित किया जाए. अटॉर्नी जनरल को सरकार का आदेश लाने की अनुमति दी जाए और 15 जनवरी की मीटिंग होने दी जाए.

पीठ ने उनके आग्रह को ठुकराते हुए कहा, हम वार्ता के लिए सौहार्दपूर्ण माहौल तैयार करना चाहते हैं. तब तक कृषि कानूनों को रोका जा सकता है. शीर्ष न्यायालय ने यह भी कहा, पुलिस कानून व्यवस्था के मसले को संभाल सकती है लेकिन प्रदर्शन का अधिकार बना रहेगा. जिस पर दवे ने बोला कि किसान यूनियन बिल्कुल अनुशासन बनाए हुए हैं और 47 दिनों में किसी तरह की कोई अप्रिय घटना नहीं हुई है. सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय से यह आग्रह किया कि आंदोलनकारियों को गणतंत्र दिवस बाधित न करने का आदेश पारित किया जाए, जिस पर पीठ ने बोला कि वह इस विषय में आवेदन दाखिल करें.

हम सुप्रीम कोर्ट, हमें जो करना है, वह करेंगे
जब एक पक्षकार ने कहा, हमें सरकार पर भरोसा है तो सीजेआई ने कहा, आपका सरकार पर भरोसा है या नहीं, इससे हमें कोई मतलब नहीं है. हम उच्चतम न्यायालय हैं और हमें जो भी करना है, वह हम करेंगे.

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लोग मर रहे हैं और आपने अभी तक उत्तर नहीं दिया
सीजेआई ने कई मौकों पर केन्द्र के उत्तर नहीं देने पर नाखुशी जताई है. बीते 17 दिसंबर को भी न्यायालय ने कृषि कानूनों के लागू करने से रोकने से संबंधित सुझाव मांगे थे, मगर केन्द्र ने कोई उत्तर नहीं दिया था. सीजेआई ने कहा, हमने पिछली बार भी आपसे बोला था, मगर आपे उत्तर नहीं दिया और केस और बिगड़ता ही गया. लोग खुदकुशी कर रहे हैं. लोग भीषण ठंड में परेशान हैं. हमने छुट्टियों से पहले ही कानूनों को रोकने को बोला था, मगर आपने अभी तक उत्तर नहीं दिया.

समिति के लिए पूर्व सीजेआई सदाशिवम से की थी बात, पर हिंदी की समस्या
सीजेआई बोबडे ने इस गतिरोध को दूर करने के लिए समिति बनाने का प्रस्ताव रखते हुए कहा, हमने पूर्व सीजेआई जस्टिस पी सदाशिवम से इस बारे में वार्ता की थी, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया कि वह हिंदी नहीं समझ पाते हैं. जिसके बाद दवे ने हिंदुस्तान के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस आरएम लोढ़ा का नाम सुझाया. तब पीठ ने कहा, हम इस विषय में उचित आदेश पारित करेंगे. यह समिति दोनों पक्षों की बात सुनेगी और उचित सिफारिशें देगी. इस सुझाव का किसानों की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों विवेक तन्खा और दुष्यंत दवे ने समर्थन किया.

ऐसा न हो सरकार को बैकफुट पर ढकेल दें और प्रदर्शन जारी रहे: साल्वे
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ एडवोकेट हरीश साल्वे ने कहा, न्यायालय आमतौर पर कानून पर रोक नहीं लगाती, हालांकि उसके पास ऐसा करने का अधिकार है. इस पर पीठ ने कहा-हम कानूनों के अमल पर रोक तो लगा ही सकते हैं. साल्वे ने बोला कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि सरकार को बैकफुट पर ढकेल दिया जाए और प्रदर्शन जारी रहे. आप कानून को रद्द करने की मांग नहीं कर सकते यदि कानून कारगर हों. साल्वे ने कहा, किसानों के प्रतिनिधि और सरकार को खुले विचारों के साथ समिति के समक्ष जाने की आवश्यकता है. दिल्ली सरकार की ओर से पेश एडवोकेट राहुल मेहरा ने कहा, गतिरोध दूर होना चाहिए लेकिन केन्द्र सरकार का रवैया ठीक नहीं है.

कोर्ट रूम लाइव

अटॉर्नी जनरल: जानकार समिति की सिफारिशों के बाद कानून बनाए गए हैं. पिछली सरकार के समय में भी ये बात चल रही थी कि किसानों को मंडियों के बाहर का विकल्प दिया जाए. किसानों से लगातार वार्ता जारी है.
सुप्रीम कोर्ट: पिछली सरकार को छोड़िए. इस सरकार की वार्ता का क्या हाल निकला. हम वार्ता के जरिए निवारण के पक्ष में हैं. पिछली दिनांक पर आपने बोला था कि वार्ता ठीक दिशा में जा रही है. आप क्यों नहीं कानून के अमल को रोक देते हैं.
सॉलिसिटर जनरल: हम भी निवारण कर रहे हैं. कई किसान संगठन हमारे पास आए, जिनका बोलना है कि कानून प्रगतिशील है.
अटॉर्नी जनरल: उच्चतम न्यायालय का ही निर्णय है कि वह कानून पर रोक नहीं लगा सकता. मैलिक अधिकारों के उल्लंघन पर रोक लगाई जा सकती है. कानून समिति की सिफारिश पर बनी है. दो तीन प्रदेश ही विरोध कर रह हैं. हरियाणा के सीएम प्रदर्शनकारियों से बात करने जा रहे थे, वहां हिंसा हुई.
सुप्रीम कोर्ट: कानून तोड़ने वाले को संरक्षण नहीं दिया जाएगा.
अटॉर्नी जनरल: किसान कह रहे हैं कि 26 जनवरी को ट्रैक्टर लेकर राजघाट जाएंगे और रैली करेंगे. इससे गणतंत्र दिवस प्रभावित होगा.
एडवोकेट दुष्यंत दवे: ऐसी योजना नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट: कानून के अमल पर रोक और कानून पर रोक में अंतर है. हम कानून के अमल पर रोक लगा सकते हैं क्योंकि यह कार्यकारी आदेश है.
अटॉर्नी जनरल: दवे ने बोला है कि किसान ट्रैक्टर लेकर नहीं आ रहे हैं रैली के लिए. यह बात रिकॉर्ड पर ली जाए.
एडवोकेट दुष्यंत दवे: हर किसान के घर में फौजी है. गणतंत्र दिवस के प्रति हमारे मन में सम्मान है. हम कभी नहीं कह रहे है कि गणतंत्र दिवस को प्रभावित करेंगे. यदि सरकार वाकई गंभीर होती तो संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाकर बहस कराती, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया.
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