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मकर संक्रांति मुहूर्त 2021 : राशि मुताबिक दान से लेकर इस दिन से जुड़ी इन खास बातों के बारे में जानिए

सनातन धर्म में सूर्य को आदि पंच देवों में से एक माना गया है. वहीं इन पंच देवों में से सूर्य ही कलयुग के एक मात्र दृश्य देव हैं. वहीं सूर्य के राशि बदलाव को संक्रांति बोला जाता है. ऐसे में सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है. हिंदुओं का प्रमुख पर्व मकर संक्रांति दान का पर्व है.

वहीं इस वर्ष भी मकर संक्रांति का ये पर्व 14 जनवरी, गुरुवार को पड़ रहा है. इस साल 2021 में संक्रांति का वाहन सिंह (व्याघ्र) एवं उपवाहन गज (हाथी) रहेगा. इस साल संक्रांति का आगमन श्वेत कपड़ा और पाटली कंचुकी धारण किए बालावस्था में कस्तूरी लेपन कर गदा आयुध (शस्त्र) लिए स्वर्णपात्र में अनाज भक्षण करते हुए आग्नेय दिशा को दृष्टिगत किए पूर्व दिशा की ओर गमन करते हो रहा है.

मकर संक्रान्ति 2021 मुहूर्त 

पुण्य काल मुहूर्त :08:03:07 से 12:30:00 तक
अवधि :4 घंटे 26 मिनट
महापुण्य काल मुहूर्त :08:03:07 से 08:27:07 तक
अवधि :0 घंटे 24 मिनट
संक्रांति पल :08:03:07

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माघ माह में कृष्ण पंचमी को मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक रूपों में मनाई जाती है. आइए जानते हैं कि मकर संक्रांति के बारे में कुछ खास बातें-
मकर संक्रांति में ‘मकर’ शब्द मकर राशि को इंगित करता है जबकि ‘संक्रांति’ का अर्थ संक्रमण अर्थात प्रवेश करना है. मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है. एक राशि को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करने की इस विस्थापन क्रिया को संक्रांति कहते हैं. चूंकि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस समय को ‘मकर संक्रांति’ बोला जाता है.
पृथ्वी साढ़े 23 डिग्री अक्ष पर झुकी हुई सूर्य की परिक्रमा करती है तब साल में 4 स्थितियां ऐसी होती हैं, जब सूर्य की सीधी किरणें 21 मार्च और 23 सितंबर को विषुवत रेखा, 21 जून को कर्क रेखा और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर पड़ती है. वास्तव में चन्द्रमा के पथ को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है जबकि सूर्य के पथ को 12 राशियों में बांटा गया है. भारतीय ज्योतिष में इन 4 स्थितियों को 12 संक्रांतियों में बांटा गया है जिसमें से 4 संक्रांतियां जरूरी होती हैं- मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति.
चन्द्र के आधार पर माह के 2 भाग हैं- कृष्ण और शुक्ल पक्ष. इसी तरह सूर्य के आधार पर साल के 2 भाग हैं- उत्तरायन और दक्षिणायन. इस दिन से सूर्य उत्तरायन हो जाता है. उत्तरायन अर्थात इस समय से धरती का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है. इसे सोम्यायन भी कहते हैं. 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन. मकर संक्रांति से लेकर कर्क संक्रांति के बीच के 6 मास के समयांतराल को उत्तरायन/उत्तरायण कहते हैं.
भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायन का महत्व बताते हुए गीता में बोला है कि उत्तरायन के 6 मास के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से आदमी का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं. यही कारण था कि भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया.
इस दिन से वसंत ऋतु की भी आरंभ होती है और यह पर्व संपूर्ण अखंड हिंदुस्तान में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है. खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं. खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं.
मकर संक्रांति के इस पर्व को हिंदुस्तान के भिन्न-भिन्न राज्यों में वहां के लोकल उपायों से मनाया जाता है. दक्षिण हिंदुस्तान में इस त्योहार को पोंगल के रूप में मनाया जाता है. उत्तर हिंदुस्तान में इसे लोहड़ी, खिचड़ी पर्व, पतंगोत्सव आदि बोला जाता है. मध्यभारत में इसे संक्रांति बोला जाता है. पूर्वोत्तर हिंदुस्तान में बिहू नाम से इस पर्व को मनाया जाता है.
सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारियां शीघ्र लगती हैं इसलिए इस दिन गुड़ और तिल से बने मिष्ठान्न या पकवान बनाए, खाए और बांटे जाते हैं. इनमें गर्मी पैदा करने वाले तत्वों के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी होते हैं. उत्तर हिंदुस्तान में इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है. गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है.
स्नान, दान, पुण्य और पूजा : माना जाता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गए थे इसलिए इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से पुण्य हजार गुना हो जाता है. इस दिन गंगासागर में मेला भी लगता है. इसी दिन मलमास भी खत्म होने तथा शुभ माह प्रारंभ होने के कारण लोग दान-पुण्य से अच्छी आरंभ करते हैं. इस दिन को सुख और समृद्धि का माना जाता है.
यह पर्व ‘पतंग महोत्सव’ के नाम से भी जाना जाता है. पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य कारण है कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना. यह समय सर्दी का होता है और इस मौसम में प्रातः काल का सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थवर्द्धक और स्कीन और हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है. अत: उत्सव के साथ ही स्वास्थ्य का भी फायदा मिलता है.
हिन्दू धर्मशास्त्रों के मुताबिक मकर संक्रांति से देवताओं का दिन शुरुआत होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है. महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं. महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था इसलिए मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है.
इसी दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है. इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समापन की घोषणा की थी. उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था. इसलिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को समाप्त करने का दिन भी माना जाता है.
ये बारह संक्रान्तियां सात प्रकार की, सात नामों वाली हैं, जो किसी हफ्ते के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर उल्लिखित हैं; वे ये हैं- मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता.
घोरा रविवार, मेष या कर्क या मकर संक्रान्ति को, ध्वांक्षी सोमवार को, महोदरी मंगल को, मन्दाकिनी बुध को, मन्दा बृहस्पति को, मिश्रिता शुक्र को एवं राक्षसी शनि को होती है. कोई संक्रान्ति
यथा मेष या कर्क आदि क्रम से मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी, मिश्रित कही जाती है, यदि वह क्रम से ध्रुव, मृदु, क्षिप्र, उग्र, चर, क्रूर या मिश्रित नक्षत्र से युक्त हों.
27 या 28 नक्षत्र को सात भागों में विभाजित हैं- ध्रुव (या स्थिर)- उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी, मृदु- अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष, क्षिप्र (या लघु)- हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, उग्र- पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा, चर- पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति, शतभिषक क्रूर (या तीक्ष्ण)- मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण)- कृत्तिका, विशाखा. उक्त वार या नक्षत्रों से पता चलता है कि इस बार की संक्रांति कैसी रहेगी.
हिन्दू धर्मशास्त्रों के मुताबिक मकर संक्रांति से देवताओं का दिन शुरुआत होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है. कर्क संक्रांति से देवताओं की रात प्रारंभ होती है. अर्थात देवताओं के एक दिन और रात को मिलाकर मनुष्‍य का एक साल होता है. मनुष्यों का एक माह पितरों का एक दिन होता है. उनका दिन शुक्ल पक्ष और रात कृष्ण पक्ष होती है.
इसी दिन से सौर साल के दिन की आरंभ मानी जाती है. हालांकि सौर नववर्ष सूर्य के मेष राशि में जाने से प्रारंभ होता है. सूर्य जब एक राशि ने निकल कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब दूसरा माह प्रारंभ होता है. 12 राशियां सौर मास के 12 माह है. दरअसल, हिन्दू धर्म में कैलेंडर सूर्य, चंद्र और नक्षत्र पर आधारित है.

सूर्य पर आधारित को सौरवर्ष, चंद्र पर आधारित को चंद्रवर्ष और नक्षत्र पर आधारिक को नक्षत्र साल कहते हैं. जिस तरह चंद्रवर्ष के माह के दो भाग होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष, उसी तरह सौर्यवर्ष के दो भाग होते हैं- उत्तरायण और दक्षिणायन. सौरवर्ष का पहला माह मेष होता है जबकि चंद्रवर्ष का महला माह चैत्र होता है. नक्षत्र साल का पहला माह चित्रा होता है.

राशि मुताबिक दान

मान्यता के मुताबिक इस दिन यदि अपनी राशि के मुताबिक दान दिया जाए तो दान से मिलने वाला फल कई गुना बढ़ जाता है. आइए जानते हैं आपकी राशि के मुताबिक कौन सा दान है शुभ
1. मेष- चादर एवं तिल का दान करें तो शीघ्र ही हर इच्छा पूरी हो सकती है.
2. वृषभ- कपड़ा एवं तिल का दान करना शुभ रहेगा.
3. मिथुन- चादर एवं छाते का दान करना बहुत लाभदायक सिद्ध होगा.
4. कर्क- साबूदाना एवं कपड़ा का दान करना शुभ फल प्रदान करने वाला रहेगा.
5. सिंह – कंबल एवं चादर का दान अपनी क्षमतानुसार करें.
6. कन्या- ऑयल तथा उड़द दाल का दान करें.
7. तुला- रुई, वस्त्र, राई, सूती वस्त्रों के साथ ही चादर आदि का दान करें.
8. वृश्चिक- खिचड़ी का दान करें साथ ही अपनी क्षमता के मुताबिक कंबल का दान भी शुभ फलदायी सिद्ध होगा.
9. धनु- चने की दाल का दान करें तो विशेष फायदा होने की आसार बनती है.
10. मकर- कंबल और पुस्तक का दान करें तो हर इच्छा पूरी हो सकती है.
11. कुंभ- साबुन, वस्त्र, कंघी और अनाज का दान करें.
12. मीन- साबूदाना,कंबल सूती कपड़ा तथा चादर का दान करें.

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