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Corona Vaccine: जानिए, कितनी सस्ती और कितनी कारगर होगी चीन की वैक्सीन?

एक तरफ पूरी दुनिया में जल्द से जल्द कोविड-19 की वैक्सीन बनाने की होड़ दिख रही है, तो दूसरी ओर चीन की साइनोवैक कोरोना वैक्सीन अब विदेशों में पहुंचने लगी है। इस होड़ में चीन दूसरों से आगे निकलता दिख रहा है। चीन की बायोफार्मा कंपनी साइनोवैक की कोविड-19 वैक्सीन ‘कोरोनावैक’ इस्तेमाल के लिए इंडोनेशिया में पहुंच चुकी है। इसके अलावा इसके 18 लाख और डोज जनवरी तक यहां पहुंचाए जाएंगे। लेकिन वैक्सीन का आखिरी स्टेज का ट्रायल अभी नहीं हुआ है। इससे सवाल पैदा होता है कि ये वैक्सीन कितनी कारगर होगी। साथ ही ये भी कि इस चीनी वैक्सीन के बारे में अब तक हमें कितना पता है?

दूसरी वैक्सीन से कैसे अलग है साइनोवैक?

कोरोनावैक एक ऐसी वैक्सीन है जो एक्टिव नहीं की गई है। ये आपके शरीर के भीतर मरे हुए वायरस के कुछ हिस्से डालती है और आपके इम्यून सिस्टम को इस मृत वायरस से निपटने देती है। इससे आपका शरीर वायरस से लड़ना सीखता है और कोई गंभीर बीमारी भी नहीं होती यानी साइड इफेक्ट नहीं होता। मॉडर्ना और फाइजर वैक्सीन एमआरएनए वैक्सीन हैं, जिसका मतलब है कि कोरोना वायरस के जेनेटिक कोड को शरीर में इंजेक्ट किया गया है, जिससे शरीर वायरल प्रोटीन बनाने लगता है, लेकिन पूरा वायरस नहीं बनाता और इस तरह शरीर का इम्यून सिस्टम वायरस पर हमला करने के लिए तैयार हो जाता है।

ननयांग टैक्नोलॉजीकल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर लुओ दहाई ने बताया, ‘कोरोनावैक पारंपरिक तरीके से बनाई गई वैक्सीन है। पहले भी कई जानी-मानी वैक्सीन बनाने के लिए इसी तरीके को अपनाया गया है।’ वो रेबीज की वैक्सीन का उदाहरण देते हैं और कहते हैं, ‘एमआरएनए वैक्सीन नई तरह की वैक्सीन हैं और फिलहाल उनका कोई सफल उदाहरण भी मौजूद नहीं है।’

कागज पर देखें तो साइनोवैक के मुख्य फायदे ये हैं कि इसे सामान्य रेफ्रिजरेटर में 2-8 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर किया जा सकता है जैसे कि ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन। मॉडर्ना की वैक्सीन को माइनस 20 डिग्री सेल्सियस पर और फाइजर की वैक्सीन को माइनस 70 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर करना पड़ता है। इसका मतलब है कि साइनोवैक और ऑक्सफोर्ड वैक्सीन विकासशील देशों में ज्यादा उपयोगी साबित होंगी जो बड़ी संख्या में इतने कम तापमान पर वैक्सीन को स्टोर करने में सक्षम नहीं हैं।

कितनी असरदार है ये वैक्सीन?

फिलहाल तो इस पर कुछ कहना मुश्किल है। लांसेट जर्नल के मुताबिक, अभी कोरोनावैक के पहले और दूसरे चरण के ट्रायल के बारे में ही जानकारी उपलब्ध है। लांसेट में छपे इस पेपर के लेखक झू फेंगकी ने कहा कि इस वैक्सीन के पहले चरण में 144 लोगों ने हिस्सा लिया और दूसरे चरण में 600 लोगों ने। इस ट्रायल के नतीजे से पता चलता है कि इमरजेंसी की स्थिति में ये वैक्सीन इस्तेमाल के लिए ठीक है। सितंबर में साइनोवैक कंपनी के यिन ने कहा था कि ‘वैक्सीन का परीक्षण हजार से ज्यादा लोगों पर किया गया है और उनमें से कुछ लोगों में ही थकान और थोड़ी परेशानी के लक्षण दिखे। ये पांच फीसदी से ज्यादा में नहीं दिखा।’

साइनोवैक का आखिरी चरण का ट्रायल अक्तूबर में ब्राजील में शुरू हुआ, जो दुनिया में कोरोना के मामलों में दूसरे नंबर पर है। लेकिन नवंबर में ट्रायल कुछ दिन के लिए रूक गया जब एक वॉलेंटियर की मौत की खबर आई। जब पता चला कि मौत का कारण वैक्सीन से संबंधित नहीं है तो फिर से ट्रायल शुरू हो गया। ब्राजील में साइनोवैक के पार्टनर बुटेनटेन संस्थान का कहना है कि साइनोवैक अपने ट्रायल के नतीजे 15 दिसंबर से पहले प्रकाशित कर देगा। प्रोफेसर लुओ बताते हैं कि फिलहाल कम जानकारी होने की वजह से वैक्सीन के असर को लेकर ज्यादा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन शुरुआती डेटा के आधार पर कह सकते हैं कि कोरोनावैक एक असरदार वैक्सीन है, लेकिन अभी तीसरे चरण के ट्रायल के नतीजों का इंतजार करना चाहिए।

कंपनी एक साल में कितनी डोज बना सकती है?

चीनी टेलीविजन नेटवर्क सीजीटीएन को साइनोवैक के चेयरमैन ने बताया कि एक साल में उनका 20 हजार स्कवेयर मीटर में फैला प्लांट 30 करोड़ डोज तैयार कर सकता है। हर वैक्सीन की तरह इस वैक्सीन की भी दो डोज होती हैं, जिसका मतलब है कि एक साल में 15 करोड़ लोगों तक ही वैक्सीन पहुंचाई जा सकती है। ये संख्या चीन की जनसंख्या का दसवां हिस्सा है। हालांकि चीन ने इंडोनेशिया में डोज पहुंचा दी है और इसके लिए तुर्की, ब्राजील, चिली के साथ भी डील कर ली है।

विश्लेषक बताते हैं कि चीन वैक्सीन कूटनीतिक रेस जीतने के लिए क्या कर रहा है। हाल ही में खबर आई थी कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वैक्सीन खरीदने के लिए कर्ज के तौर पर अफ्रीकी महाद्वीप के लिए दो अरब डॉलर, लातिन अमेरिकी और कैरिबियाई देशों के लिए एक अरब डॉलर रखे हैं, लेकिन अभी कर्ज की शर्तों के बारे में ज्यादा नहीं पता। एबीसी न्यूज को मैरिक्स के एक विश्लेषक जेकब मार्डेल ने कहा, ‘चीन इस लाइफ सेविंग तकनीक के इस्तेमाल अपने व्यापारिक और कूटनीतिक फायदे के लिए करेगा। उसके पास वो है जो सभी देशों की जरूरत है और वो वैक्सीन के इन प्रावधानों को चैरिटी की तरह दिखाने की कोशिश करेगा।’

अभी ये नहीं पता कि इसकी कीमत क्या होगी, लेकिन साल की शुरुआत में बीबीसी की टीम ने चीन के शहर यीवू में देखा था कि नर्सें 400 यूआन में इंजेक्शन लगा रही थीं यानी 60 डॉलर में एक इंजेक्शन। इंडोनेशिया की सरकारी कंपनी बायो फार्मा ने बताया कि वहां इसकी कीमत 200,000 रूपिया यानी 13.60 डॉलर के आस-पास होगी। ये ऑक्सफोर्ड वैक्सीन से ज्यादा है जिसकी एक डोज की कीमत चार डॉलर है। वहीं, ये मॉडर्ना से काफी कम है जिसकी एक डोज की कीमत 33 डॉलर है। मॉडर्ना का कहना है कि वो 2021 में 50 करोड़ डोज शिप करेगी। ऑक्सफोर्ड का कहना है कि वो 2021 की पहली तिमाही में 70 करोड़ डोज तैयार करेगी।

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चीन में दूसरी वैक्सीन किस स्टेज पर हैं?

चीन मे बन रही चार और कोरोना वैक्सीन अपने फाइनल स्टेज में हैं। उनमें से एक साइनोफार्म अब तक चीन में 10 लाख लोगों में बांटी जा चुकी है। साइनोफार्म ने भी अभी तीसरे चरण के ट्रायल के नतीजों को प्रकाशित नहीं किया है। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के प्रोफेसर डेल फिशर ने सीएनबीसी को बताया, ‘टीका बनाने के किसी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए आपात स्थिति में अधिकृत करने का रास्ता अपनाया जा सकता है, मगर उससे पहले तीसरे चरण के ट्रायल के आकलन का इंतजार करना सामान्य है।’

प्रोफेसर फिशर ने कहा कि इस तरह का कदम ‘पारंपरिक नहीं है’ और ये पश्चिमी देशों में अस्वीकार्य होगा। चीन में भी अधिकतर समय वायरस का फैलना सीमित ही रहा और जनजीवन धीरे-धीरे एक नए तरीके से ही सही मगर सामान्य हो रहा है। साइनोफार्म नौ दिसंबर को संयुक्त अरब अमीरात में पंजीकृत हुआ था। तब अधिकारियों ने कहा था कि जुलाई में शुरू हुए तीसरे चरण के ट्रायल के अंतरिम नतीजों में वैक्सीन को 86 प्रतिशत तक प्रभावी बताया गया था। यूएई अधिकारियों ने ये नहीं बताया है कि वैक्सीन या टीके का इस्तेमाल अब कैसे होगा।

वैक्सीन की रेस में और कौन-कौन शामिल?

ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन

ये वायरल वेक्टर टाइप वैक्सीन है, जिसमें जेनेटिकली मॉडिफाइड वायरस का इस्तेमाल किया गया है। इसे फ्रिज में सामान्य तापमान पर स्टोर किया जा सकता है और इसकी दो डोज लेनी होंगी। अब तक क्लिनिकल ट्रायल में इसे 62 से 90 फीसदी तक कारगर पाया गया है। इस वैक्सीन के प्रति डोज की कीमत चार डॉलर तक होगी।

मॉडर्ना की वैक्सीन
ये एमआरएनए टाइप की कोरोना वैक्सीन है जिसे वायरस के जेनेटिक कोड के कुछ टुकड़े शामिल कर बनाया जा रहा है। इसे माइनस 20 डिग्री तापमान पर स्टोर करने की जरूरत होगी और इसे छह महीनों तक ही स्टोर किया जा सकेगा। इसकी दो डोज लेनी होंगी और अब तक हुए क्लिनिकल ट्रायल में इसे 95 फीसदी तक कारगर पाया गया है। इस वैक्सीन के प्रति डोज की कीमत 33 डॉलर तक होगी।

फाइजर की वैक्सीन

मॉडर्ना की वैक्सीन की तरह ये भी एमआरएनए टाइप की कोरोना वैक्सीन है। अब तक हुए क्लिनिकल ट्रायल में इसे 95 फीसदी तक कारगर पाया गया है। इसे माइनस 70 डिग्री के तापमान पर स्टोर करना होगा। ये वैक्सीन दो डोज दी जाएगी और प्रति डोज की कीमत 15 डॉलर तक होगी।

गमलेया की स्पूतनिक-वी वैक्सीन

ये ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन की तरह वायरल वेक्टर टाइप वैक्सीन है, जिसके अब तक हुए क्लिनिकल ट्रायल में 92 फीसदी तक कारगर पाया गया है। इसे फ्रिज में सामान्य तापमान पर स्टोर किया जा सकता है और इसकी दो डोज लेनी होंगी। इस वैक्सीन के प्रति डोज की कीमत 7.50 डॉलर तक होगी। इसके अलावा रूस स्पूतनिक नाम की एक और वैक्सीन का इस्तेमाल कर रहा है। वहीं चीनी सेना ने कैनसाइनो बायोलॉजिक्स की बनाई एक वैक्सीन को मंजूरी दे दी है। ये दोनों वैक्सीन ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन की तरह वायरल वेक्टर टाइप वैक्सीन हैं।

 

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