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नए विवाद में फंसा WHO: कोरोना को लेकर छुपाई यह खास रिपोर्ट, इटली से उठे ये बड़े सवाल

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) एक नए विवाद में फंस गया है। उस पर इल्जाम लगा है कि उसने एक रिपोर्ट को दबाने में इटली के स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े रहे अधिकारियों की मदद की। उस रिपोर्ट से ये जाहिर होता है कि इटली ने शुरुआती दौर में कोरोना वायरस महामारी के भारी अनदेखी की। आरोप यह है कि अगर वो रिपोर्ट सबके सामने रहती, तो उससे दूसरे देशों को इस महामारी से निपटने में मदद मिलती। लेकिन डब्ल्यूएचओ इस रिपोर्ट को छिपाने में भागीदार बन गया।

World Health Organization leaders at a press briefing on COVID-19, held on March 6 at WHO headquarters in Geneva. Here’s a look at its history, its mission and its role in the current crisis.

इटली यूरोप का पहला देश था, जहां कोरोना वायरस संक्रमण की सबसे जोरदार मार पड़ी थी। वहां के तब की हालत पर ये रिपोर्ट डब्ल्यूएचओ के वैज्ञानिक फ्रांसेस्को जामबोन और कई यूरोपीय देशों से संबंधित उनके दस सहयोगियों ने तैयार की थी। ये अध्ययन कुवैत के दिए धन से हुआ। अध्ययन का मकसद उन देशों को सूचनाएं उपलब्ध कराना था, जो उस समय तक कोरोना महामारी की मार से बचे हुए थे।
ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने बीते अगस्त में इस रिपोर्ट के बारे में एक खबर छापी थी। उसमें बताया गया था कि ये रिपोर्ट डब्ल्यूएचओ की वेबसाइट पर पिछले 13 मई को प्रकाशित हुई। लेकिन उसके अगले दिन उसे वहां से हटा दिया गया। द गार्जियन की खबर के मुताबिक 102 पेज की उस रिपोर्ट में बताया गया था कि इटली ने महामारियों से निपटने की अपनी योजना में 2006 के बाद कोई सुधार नहीं किया था। इस कारण वह नई महामारी का सामना करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। लेकिन जब कोरोना महामारी आई, तो इटली के अस्पतालों में जरूरी चीजों का अभाव देखा गया और वहां अफरातफरी का आलम रहा।

अब सामने आई जानकारी के मुताबिक ये रिपोर्ट डब्ल्यूएचओ के स्ट्रेटेजिक इनिशिएटिव डिपार्टमेंट के सहायक महानिदेशक रेनिरी गुएरेरा के आग्रह पर हटाई गई। गुएरेरा 2014 से 2017 के बीच इटली के स्वास्थ्य मंत्रालय में रोग रोकथाम विभाग के महानिदेशक रह चुके थे। इस तरह उस दौर में महामारी से निपटने की तैयारी की योजना को अपडेट करने की जिम्मेदारी उनकी ही थी। उसी दौर में डब्ल्यूएचओ और यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन ने महामारी योजना के बारे में नए दिशा-निर्देश जारी किए थे। लेकिन इटली में इसकी उपेक्षा की गई। अब गुएरेरा कोविड-19 से निपटने के लिए इटली में बनाए गए टास्क फोर्स के सदस्य भी हैं।

इटली में सेना के रिटायर्ड जनरल पियर पाओलो लुनेली ने भी एक अलग जांच रिपोर्ट तैयार की है। इसमें कहा गया है कि अस्पतालों में महामारी से निपटने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रोटोकॉल का पालन हुआ होता, तो तकरीबन दस हजार लोगों को मरने से बचाया जा सकता था।

अब इटली में डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट दबाने के मामले की जांच शुरू की गई है। लेकिन आरोप है कि डब्ल्यूएचओ इसमें सहयोग नहीं कर रहा है। उसने तकनीकी सवालों के आधार पर जामबोन को जांचकर्ताओं के सामने पेश होने की राह में रुकावटें डाली हैं। जबकि जामबोन ने कहा है कि वे गवाही देने के लिए तैयार हैं। जामबोन डब्ल्यूएचओ से जुड़े हैं और फिलहाल वेनिस में पोस्टेड हैं।

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द गार्जियन से बातचीत में जामबोन ने कहा कि जब उन्होंने रिपोर्ट तैयार की थी, तब गुएरेरा ने उन्हें यह कहते हुए धमकी दी थी कि अगर रिपोर्ट को उन मनमाफिक नहीं बदला गया, तो वे उन्हें बर्खास्त करवा देंगे।

इस विवाद पर अपनी सफाई में डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि वह फिलहाल इटली की सरकार के साथ इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करने में जुटा है। उसने कहा कि जब रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई थी, तभी ये फैसला किया गया था कि गलतियों से बचने के लिए महामारी से संबंधित रिपोर्ट नए तरीके का पालन करते हुए तैयार की जाएंगी। इसी बीच ये रिपोर्ट वेबसाइट पर छप गई, जिसे हटाया गया और उस कारण भ्रम पैदा हुआ। इटली के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस मामले में अपनी किसी मिलीभगत की संभावना से इनकार किया है।

बहरहाल, जिस समय डब्ल्यूएचओ की साख दुनिया के लिए बेहद अहम है, उस समय उसकी भूमिका पर नए सवाल उठना अफसोसनाक है। कोरोना महामारी के शुरुआती दिनों में चीन में इसे दबाने की कोशिशों के प्रति लापरवाही बरतने के आरोप भी इस संस्था पर लगे थे। अब नए विवाद से उसकी भूमिका और ज्यादा संदिग्ध हो गई है।

 

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