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जगदीश चंद्र बोस , जाने कैसे बने बहुमुखी प्रतिभा वैज्ञानिक

दुनिया में ऐसे कम लोग होते हैं जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं. इनमें जगदीश चंद्र बोस को भी शामिल किया जा सकता है, जो बहु विज्ञानी थे. वे भारत के ऐसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे, जिन्हें भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान और पुरातत्व का गहरा ज्ञान था.

उन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर कार्य करने के अलावा वनस्पति विज्ञान में भी उन्होनें कई महत्त्वपूर्ण आविष्कार किये. आपको जानकारी दे दें कि रविंद्र नाथ टैगोर,विवेकानंद और राजा राममोहन रॉय के समकालीन  रहे  जगदीश चंद्र बोस का जन्म फरीदपुर में भगवान चन्द्र बोस के यहां 30 नवम्बर 1858 को हुआ था.बचपन ररौली में गुजारने वाले जेसी बोस ने सेन्ट ज़ैवियर महाविद्यालय, कलकत्ता से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. फिर लंदन विश्वविद्यालय में चिकित्सा की शिक्षा लेने गए.1896 में उन्होंने लंदन से डॉक्टरेट की उपाधि ली.

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जेसी बोस का नाम इसलिए आदर से लिया जाता है कि उन्होंने ऐसे समय में वैज्ञानिक खोज की जब देश में इसे कोई नहीं जानता था.महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किये. इन्होंने बेतार के संकेत भेजने में असाधारण प्रगति की और सबसे पहले रेडियो संदेशों को पकड़ने के लिए अर्धचालकों का प्रयोग किया. बाद में उन्होंने सूक्ष्म तंरगों (Microwave) के क्षेत्र में वैज्ञानिक कार्य शुरू कर यह भी सिद्ध किया कि पेड़ पौधों के भी जीवन होता है . पौधे भी सजीवो के समान सांस लेते हैं.उन्होंने cresco graph नामक ऐसा यंत्र बनाया जिससे पेड़ पौधों के गति देखी जा सकती थी.इस अद्भुत खोज के लिए उन्हें रॉयल सोसाइटी की सदस्यता दी गई.

खास बात यह है कि जेसी बोस ने जितने भी शोध और प्रयोग किये वे अर्थ के  अभाव  में किसी अच्छी प्रयोगशाला में नहीं हुए. जगदीश चन्द्र बोस एक अच्छी प्रयोगशाला बनाने की इच्छा रखते हुए 78 वर्ष की आयु में 23 नवम्बर 1937 को गिरिडीह (झारखण्ड ) में इस दुनिया को विदा कह गये.उनकी अधूरी तमन्नाओं को देखते हुए ही कोलकाता स्थित बोस विज्ञान मन्दिर इसी विचार से प्रेरित है, जो विज्ञान में शोध कार्य के लिए प्रसिद्ध है. बहु विज्ञानी जेसी बोस के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता.

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