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भारत-नेपाल के रिश्ते में आया मोड़, जाने केपी शर्मा ओली ने की चीनी राजदूत से मुलाकातें

सत्तारूढ़ यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की 18 नवंबर को होने वाली महत्वपूर्ण बैठक फिर स्थगित कर दी गई। दस दिन में दूसरी बार ऐसी अटकलों के बीच बैठक स्थगित हुई है कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली या तो संसद को भंग कर देंगे और चुनाव का आह्वान करेंगे या पार्टी विभाजित हो जाएगी।

अटकलें ये भी हैं कि वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रह सकते हैं या अपने विरोधियों को चुनौती देने से रोकने के लिए पार्टी के ताकतवर गुट का नेतृत्व कर सकते हैं।

विगत 17 नवंबर को ओली ने राष्ट्रपति और चीनी राजदूत से मुलाकातें की थीं, जिससे इस अटकल को बल मिला कि नेपाल का सबसे ज्वलंत मुद्दा निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकता है। पार्टी के जिस शीर्ष निकाय की बैठक स्थगित हुई है, उसमें ओली का गुट चार बनाम पांच के आंकड़े से अल्पसंख्यक है। पूर्व प्रधानमंत्री और पार्टी के सह-अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड विरोधी गुट का नेतृत्व कर रहे हैं। नौ सदस्यीय इस निकाय के पांच सदस्य अर्थात दहल, माधव नेपाल, झलनाथ खनाल, बामदेव गौतम और नारायण काजी श्रेष्ठ बैठक के लिए दबाव डाल रहे हैं। जबकि बिष्णु पोडेल, ईश्वर पोखरेल और ओली के साथ राम बहादुर थापा बार-बार बैठक को स्थगित कर देते हैं।
विरोधी गुट ओली पर अंकुश लगाना चाहता है, जिन पर वे भ्रष्टाचार, कुशासन और भाई-भतीजावाद का आरोप लगाते हैं। जबकि ओली का कहना है कि बहुदलीय लोकतंत्र में पार्टी उनकी सरकार को नियंत्रित नहीं कर सकती। हालांकि विगत सितंबर में वह विरोधी गुट से समझौते के लिए तैयार हो गए थे। प्रचंड के नेतृत्व वाले गुट ने उन पर कुछ खास आरोप लगाते हुए चिट्ठी लिखी थी। कई दिनों की दुविधा के बाद ओली ने कहा कि इस पत्र को वापस ले लिया जाए, क्योंकि वह इसका जवाब नहीं देंगे। बैठक कब होगी और इसका क्या नतीजा होगा, इसके बारे में कयास लगाना मुश्किल है। लेकिन नेपाल के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में जो संकट उत्पन्न हुआ है, उसके स्थायी समाधान से संबंधित संकेत अच्छे नहीं हैं।
नेपाल का यह संकट तब सामने आया है, जब कई महीनों तक भारत को जान-बूझकर नाराज करने और नेपाल के संशोधित नक्शे में विवादित कालापानी क्षेत्र को दर्शाने के बाद ओली भारत के साथ रिश्ता सुधारने की कोशिश में लगे थे। कुछ ही हफ्तों के भीतर भारतीय सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवाने के दो नेपाल दौरों ने माहौल बनाया और इस महीने के अंत में विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला काठमांडू जाने वाले हैं। ओली ने अपनी क्षमता से परे जाकर राष्ट्रीय नक्शे में विवादित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को संविधान में वैध घोषित करने के लिए शामिल किया। पाठ्यपुस्तकों में भी इस बदलाव को शामिल किया गया, पर फिर ओली ने अपना रुख नरम कर नए नक्शे का वितरण रोक दिया, ताकि बातचीत के लिए माहौल बनाया जा सके। नरवाने की दूसरी यात्रा से पहले ओली ने अपने आक्रामक रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल को पद से हटा दिया, जिन्होंने सपष्टवादी भारतीय सेना प्रमुख को बुलाए जाने का विरोध किया था। रक्षा मंत्रालय अब ओली के पास ही है।

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नेपाल पर नजर रखने वाले भारतीय मानते हैं कि दूसरे वैश्विक नेताओं की तरह ओली भी अपने विरोधियों को दूर रखने के लिए ‘राष्ट्रवादी’ तेवर दिखा रहे हैं, पर वे जानते हैं कि ऐसा लंबे समय तक नहीं चल सकता। दूसरी तरफ चीन के ग्लोबल टाइम्स अखबार का अनुमान है कि चीन को परेशान करने के लिए भारत अमेरिका की तरफ से विपक्षी नेपाली कांग्रेस के माध्यम से काम कर रहा है। क्या भारत और नेपाल पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं?

नेपाल एक अनूठा दक्षिण एशियाई देश है। भौतिक और भौगोलिक दृष्टि से चारों तरफ से घिरा यह देश तेजी से पूर्व और पश्चिम की प्रतिद्वंद्वी विदेशी शक्तियों के लिए खेल का मैदान बन रहा है, जिनके राजनीतिक हित भिन्न-भिन्न हैं। भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों के बीच स्थित नेपाल दोनों देशों के साथ जुड़े रहने की कोशिश करता है। वह चीन से आर्थिक समृद्धि और राजनीतिक प्रेरणा चाहता है। लेकिन सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक भलाई के लिए यह भारत पर निर्भर है, जिसके पांच राज्यों के साथ वह खुली सीमाएं साझा करता है। ऐसे में, यही कहा जाता है कि नेपाल में अच्छा-बुरा जो भी होता है, वह भारत के कारण होता है। यह दक्षिण एशिया का अकेला राष्ट्र है, जहां कम्युनिस्ट शासन है। लेकिन जिस तरह से पिछले दो दशकों में यह राजशाही से बहुदलीय लोकतंत्र तक पहुंचा है, और इस दौरान उसे बाधाओं का सामना करना पड़ा, जो बताता है कि इसकी राजनीति और शासन की चुनौतियां दूसरों से अलग नहीं हैं। नेपाल की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी का वैचारिक और सैद्धांतिक मुद्दा विलीन हो गया है, सिर्फ वैयक्तिक अहं का अतिरेक तथा सत्ता की भूख ही सुनाई देती है। कम्युनिस्ट संसद में दो तिहाई बहुमत में हैं, लेकिन इसका उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है।

हाल के दिनों में विभिन्न कारणों से भारत-नेपाल संबंधों में खटास आई है। नेपाल अपने आंतरिक मामलों में बहुत अधिक भारतीय हस्तक्षेप का आरोप लगाता है। इसका मुकाबला करने के लिए उसने पुराने कालापानी मुद्दे को एकतरफा ढंग से नक्शे में शामिल करके उभारा है। लेकिन अब भारत और नेपाल के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने की परस्पर कोशिश तब सामने आई है, जब नेपाल के उत्तर-पश्चिम में चीन द्वारा भूमि पर कब्जा करने की विश्वसनीय खबरें आई हैं। कालापानी भारत-चीन सीमा पर स्थित लिपुलेख दर्रे के पास है। यह एक स्वीकृत सीमा व्यापार बिंदु है और पवित्र/आध्यात्मिक पर्वत कैलाश-मानसरोवर तीर्थ यात्रा का मार्ग है, जो हिंदुओं, बौद्धों और जैनियों के लिए पवित्र है। क्रॉसिंग पॉइंट को एकतरफा ढंग से नेपाली क्षेत्र घोषित करने वाला काठमांडू अगर आगामी गर्मी में भारतीय तीर्थयात्रियों को जाने देने से रोकता है, तो इसका अप्रिय परिणाम हो सकता है। पहले ही सीमा पर चीन की आक्रामकता का मुकाबला करता भारत टकराव का एक और मोर्चा नहीं चाहता। लेकिन इसे अपनी राजनीतिक और सैन्य मजबूती को बरकरार रखने के लिए धैर्य से पेश आना होगा।

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