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फिरोज से शादी करने के बाद कैसी थी इंदिरा गांधी कि जिंदगी? जानिए कुछ छुपे हुए राज…

इंदिरा गांधी कि विवाहित जिंदगी कुछ खास नहीं रही। उन्होंने एक फिरोज खान नामक युवक से शादी कि थी, जो कि एक गुजराती मुसलमान था। शादी के बाद इंदिरा गांधी के जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए जिसके कारण से उनके विवाहित जीवन में खटास पैदा हो गई।
इंदिरा गांधी कि मुलाकात फिरोज से इलाहाबाद में हुई थी। दोनों पुरानी जान पहचान वाले होने के कारण, जब दोनों ब्रिटेन में थे तो वहां अक्सर मिला करते थे। उस समय फिरोज वहां लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ते थे।
जब इंदिरा गांधी 16 वर्ष कि थी तो फिरोज ने उन्हें प्रपोज किया था किंतु इंदिरा गांधी ने उनके प्रपोजल को ठुकरा दिया। उसके कुछ 3 वर्ष बाद इंदिरा की मां की मृत्यु हुई तो वह बेहद कमजोर महसूस करती थी। उस समय फिरोज ने इंदिरा गांधी का खूब साथ दिया और इंदिरा गांधी को भी फिरोज में एक अच्छा दोस्त नजर आने लगा।
अपने पिता जवाहरलाल नेहरु को इंदिरा ने फिरोज और अपनी शादी का फैसला जब सुनाया तो उस समय नेहरु देहरादून की जेल में थे। इस बात को सुनकर नेहरू ने कुछ नहीं कहा। बाद में जब नेहरू इंदिरा से मिले तो उन्हें समझाया कि उनका स्वास्थ्य कमजोर है, डॉक्टरों ने भी कहा था कि अभी इंदिरा की तबीयत ठीक नहीं है और ऐसे में शादी जैसी बड़ी जिम्मेदारी लेना उचित नहीं होगा। इसके जवाब में इंदिरा ने कहा की वह एक साधारण जिंदगी जीना चाहती है, शादी करके अपना घर बसाना चाहती है, शादी करके अपना एक छोटा सा परिवार बसाना चाहती हैं, जहां चैन और सुकुन हो।
जब नेहरू ने यह बात इंदिरा गांधी के मुंह से सुनी तो वह हैरान रह गए। उस समय नेहरू फिरोज और इंदिरा के बनते रिश्ते से खुश नहीं थे लेकिन उन्होंने अपनी उदासी को छुपाए रखा। उसके कुछ समय बाद 1942 में इंदिरा और फिरोज खान ने शादी कर ली और उसके 2 वर्ष बाद 1948 में दोनों ने अपनी पहली संतान को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने राजीव रखा। शादी के बाद जब इंदिरा राजनीति में अपनी रुचि बढ़ाने लगी और अपने पिता के हर काम में सहयोग देने लगी तो उनकी शादी का रिश्ता कमजोर पड़ने लगा।
पुपुल जयकर ने इंदिरा की बायोग्राफी में लिखा है, “पिता की खराब होती तबीयत को देख और उनकी सहायता के लिए इंदिरा आनंदभवन, इलाहाबाद आगई। अपने पति को छोड़कर यहां रहना इंदिरा गांधी के लिए एक बहुत ही बड़ा फैसला था।
उसी दौरान फिरोज ने अखबार ‘नेशनल हेराल्ड’ का कार्यभार संभाल लिया। 1937 में नेहरू ने ही इस अखबार की स्थापना की थी। पुपुल ने यह भी लिखा है कि जब फिरोज इंदिरा से अलग हुए तो वह एक मुस्लिम महिला के प्रेम में पड़ गए। इंदिरा को यह बात तब पता चली जब वह दूसरी बात गर्भवती थी और 1946 के दिसंबर में वह अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली थी।
दोनों के रिश्ते में ओर खटास आने लगी दोनो राजनीतिक सफलता को प्राप्त कर रहे थे, किंतु उनका पारिवारिक जीवन मतभेदों से भरा पड़ा था। इसी बीच 1958 सितंबर को इंदिरा जब अपने पिता के साथ भूटान दौरे पर गई तो उन्हें वहां हलका सकून महसूस हुआ। लेकिन उसी सफर के दौरान उन्हें यह सूचना प्राप्त हुई की फिरोज को दिल का दौरा पड़ा है। जब इंदिरा वहां से लोटी तो फिरोज खतरे से बाहर थे और दोनों में समझोता हो गया। दोनों एक महीने की छुट्टी के लिए श्रीनगर चले गए। कुछ समय के लिए दोनों में सब कुछ ठीक रहा किंतु फिर से रिश्ते में वही तनाव आने लगा।
फिर एक समय आया जब कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर इंदिरा गांधी का नाम प्रस्तावित किया गया। फिरोज को यह हल्का सा भी रास नहीं आया। वह अपने घर के अंदर ही रहने लगे, बाहर जाना तो छोड़ ही दिया। फिर वह दिन आया जब 2 फरवरी को केवल 41 वर्ष की आयु में इंदिरा को कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया। और दूसरी और 48 वर्ष की आयु में फिरोज चल बसे।
इंदिरा कि जिंदगी भी खाली सी हो गई। दोनों में आखरी कई वर्ष लड़ते झगड़ते ही गुजरे थे किंतु थे तो वह पति-पत्नी ही। इंदिरा काफी उदास रहने लगी। उनको वह याद था कि कैसे फिरोज में उनकी माता की मृत्यु के बाद उन्हें संभाला था।

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