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IAS बनने के लिए इस मां ने किया था त्याग, 2 साल रही मासूम बेटे से दूर

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2017 के यूपीएससी में सेकंड रैंक हासिल करने वाली टॉपर एक चार साल के बेटे की मां है। MBA करने के बाद सिविल सर्विसेस में आने वाली अनु कुमारी की सक्सेस स्टोरी बेहद इंस्पायरिंग है। इन्होंने 20 लाख रुपए सालाना पैकेज की प्राइवेट जॉब छोड़कर यूपीएससी की तैयारी करने का रिस्क उठाया था।

हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली अनु कुमारी ने एक इंटरव्यू में बताया, “मेरे पिता स्थानीय हॉस्पिटल के HR डिपार्टमेंट में थे। हम चार भाई-बहन हैं, जिनमें मैं दूसरे नंबर पर हूं।” “इंटरमीडिएट के बाद मैंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज में एडमिशन लिया था। मैं डेली सोनीपत से दिल्ली ट्रेन के जरिए अप-डाउन करती थी। मैं घर का आराम छोड़ना नहीं चाहती थी। इसलिए हॉस्टल की जगह डेली अप-डाउन को चुना था।” पहली बार अनु घर से दूर MBA में एडमिशन के बाद गई थीं। उन्हें नागपुर के कॉलेज में एडमिशन मिला था। “शुरुआत में मुझे घर की याद आती थी, फिर पढ़ाई और दोस्तों ने मुझे नई लाइफ में सेटल कर दिया।”

बेटे विहान के साथ अनु कुमारी।

अनु बताती हैं, “पीजी के बाद मेरी पहली जॉब आईसीआईसीआई बैंक में लगी थी। फिर मैंने 20 लाख रुपए सालाना के पैकेज पर अवीवा लाइफ इंश्यॉरेंस कंपनी ज्वाइन की।

अपने परिवार के साथ खुशी मनातीं यूपएससी 2017 टॉपर अनु कुमारी।

मेरे हसबैंड वरुण दहिया बिजनेसमैन हैं। हमारा 4 साल का बेटा है विहान।” “मेरे मामा अकसर कहा करते थे कि मुझे सिविल सर्विसेस की तैयारी करना चाहिए। मुझे भी इसमें इंटरेस्ट जागा, लेकिन पहले मैं खुद को फाइनेंशियली सिक्यॉर करना चाहती थी। 2016 में उन्होंने मेरे भाई के साथ मिलकर चोरी छुपे मेरा फॉर्म भरवा दिया था। यह बात जानकर मैंने अपनी पूरी एनर्जी UPSC में लगाने की ठान ली। इसके लिए मैंने अपनी जॉब भी छोड़ दी थी।”

अनु ने नागपुर के IMT से MBA किया है।

मेरे पास तैयारी के लिए सिर्फ डेढ़ महीने थे। मुझे पता था कि सिलेक्शन मुश्किल होगा, लेकिन मैं कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी। पहली बार में कुल 1 मार्क से मैं कटऑफ लिस्ट में आने से रह गई थी। सिलेक्शन तो नहीं हुआ, लेकिन सेकंड अटैम्पट की तैयारियों का आधार जरूर तैयार हो गया।

इस IAS बनने के सफर में अनु कुमारी को उनके हसबैंड ने पूरा सपोर्ट किया।

उन्होंने बताया, फर्स्ट अटैम्प्ट में सिर्फ एक मार्क की वजह से पिछड़ना मुझे खल रहा था। मैंने ठान लिया कि इस बार तो करके ही दिखाना है। मेरा बेटा तब कुल तीन साल का था। सिविल सर्विसेस में आने के लिए मुझे उससे पूरे दो साल तक दूर रहना पड़ा। मैंने उसे अपनी मां के पास छोड़ा और पूरी तरह प्रिपरेशन में जुट गई। इसमें मेरे हसबैंड ने मेरा पूरा साथ दिया। बेटे से दूर होना मुझे सबसे बुरा लगता था। छोटी सी मुलाकात के बाद जब हम अलग होते थे तो वह बहुत रोता था। उससे ज्यादा मैं रोती थी, लेकिन यह त्याग जरूरी था।

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