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राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद : सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार ने मुस्लिम संगठनों का…

बाबरी मस्जिद के मुकदमें में सबसे ज़ोरदार पक्ष यह है कि “रामलला विराजमान” को इस मुकदमें का तीसरा पक्षकार बना दिया गया है.सवाल है कि रामलला के वकालतनामे पर दस्तखत के बेगैर ही वकील “रामलला” की अदालत में कैसे पैरवी कर रहे हैं ? और न्यायधीश उन वकीलों को रामलला विराजमान के वकील के तौर पर बिना वकालतनामे के मान कैसे रहे हैं ?
यह समय काल भारत की राजनीति का सबसे ज़हरीला काल था और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के शहादत की पटकथा लिखी जा चुकी थी , इस हालात में जहाँ देश के कानून और संविधान के सहारे देश की व्यवस्था को संभालने की ज़िम्मेदारी तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव की थी.
पी वी नरसिंह राव बाबरी मस्जिद की रक्षा ना कर सके , और उसे गिरा कर वहाँ मौजूदा राम मंदिर बनाने का भरपूर समय प्रदान किया.खुद नरसिंह राव का स्पष्टीकरण था कि मामला प्रदेश सरकार के अधिकार क्षेत्र का था , परन्तु सवाल यह है कि फिर कल्याण सिंह की तत्कालीन सरकार बर्खास्त क्यूं की ? जबकि जो होने वाला था उसके संकेत मिल रहे थे ,
कहाँ चली गयीं थीं देश की इंटेलिजेन्स एजेन्सियाँ ?अपनी किताब ‘अयोध्या, 6 दिसम्बर 1992’ में राव ने लिखा है, ‘प्रदेश सरकार ने विभिन्न मंचों से ढांचे के बचाव का आश्वासन दिया था. 2 नवम्बर 1991 को राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में मुख्यमंत्री ने ऐसा आश्वासन दिया था.
बहरहाल, अब एक बार फिर से यूपी में भाजपा की सरकार है और सीएम हैं योगी. फिलहाल इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में सुनाई चल रही है.इस बीच अब खबर है कि मौजूदा योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि मुस्लिम संगठन इस मामले में देरी कर रहे हैं. सरकार ने कहा है कि मुस्लिम संगठन मांग कर रहे हैं कि 1994 के एक फैसले पर पुनर्विचार किया जाये,
जिससे कि इस मामले में फैसला आने में देरी हो रही है.बता दें कि इस मामले में मूल याचिकाकर्ता एम सिद्दीक ने 1994 के एम इस्माइल फारूकी मामले के इन निष्कर्षों पर आपत्ति जताई थी. इसमें कहा गया था कि मस्जिद मुसलमानों की नमाज का अभिन्न हिस्सा नहीं है.
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